भगवान कृष्ण के मुकुट में हमेशा मोर का ही पंख क्यों लगाया जाता है?
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इसका पहला कारण तो यह है कि मोर ही अकेला एक ऐसा प्राणी है, जो ब्रह्मचर्य को धारण करता है, जब मोर प्रसन्न होता है तो वह अपने पंखो को फैला कर नाचता है. और जब नाचते-नाचते मस्त हो जाता है, तो उसकी आँखों से आँसू गिरते है और मोरनी इन आँसू को पीती है और इससे ही गर्भ धारण करती है,मोर में कही भी वासना का लेश भी नही है,और जिसके जीवन में वासना नहीं, भगवान उसे अपने शीश पर धारण कर लेते है.
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वास्तव में श्री कृष्ण का मोर मुकुट कई बातों का प्रतिनिधित्व करता है, यह कई तरह के संकेत हमारे जीवन में लाता है.अगर इसे ठीक से समझा जाए तो कृष्ण का मोर-मुकुट ही हमें जीवन की कई सच्चाइयों से अवगत कराता है. दरअसल मोर का पंख अपनी सुंदरता के कारण प्रसिद्ध है. मोर मुकुट के जरिए श्रीकृष्ण यह संदेश देते हैं कि जीवन में भी वैसे ही रंग है जैसे मोर के पंख में है. कभी बहुत गहरे रंग होते हैं यानी दुख और मुसीबत होती है तो कभी एकदम हल्के रंग यानी सुख और समृद्धि भी होती है.जीवन से जो मिले उसे सिर से लगा लें यानी सहर्ष स्वीकार कर लें.
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तीसरा कारण भी है, दरअसल इस मोर-मुकुट से श्रीकृष्ण शत्रु और मित्र के प्रति समभाव का संदेश भी देते हैं. बलराम जो कि शेषनाग के अवतार माने जाते हैं, वे श्रीकृष्ण के बड़े भाई हैं. वहीं मोर जो नागों का शत्रु है वह भी श्रीकृष्ण के सिर पर विराजित है. यही विरोधाभास ही श्रीकृष्ण के भगवान होने का प्रमाण भी है कि वे शत्रु और मित्र के प्रति समभाव रखते हैं.
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ऐसा भी कहते है कि राधा रानी के महलों में मोर थे और वे उन्हें नचाया करती थी जव वे ताल ठोकती तो मोर भी मस्त होकर राधा रानी जी के इशारों पर नाचने लग जाती एक बार मोर मस्त होकर नाच रही थी कृष्ण भी वहाँ आ गए और नाचने लगे तभी मोर का एक पंख गिरा तो श्यामसुन्दर ने झट उसे उठाया और राधा रानी जी का कृपा प्रसाद समझकर अपने शीश पर धारण कर लिया.।
Saturday, 21 February 2015
कुछ कृष्ण के बारे में भी जान लिया जाय ।
Wednesday, 4 February 2015
पाद के प्रकार
'पादना' बुरी बात नहीं है भाई!!
आज में ऐसे विषय पर बात कर रहा हूँ जो इंसान के इस पृथ्वी पर आगमन के समय से ही सदा बेहद
उपयोगी परन्तु बेहद उपेक्षित विषय रहा है, और जिसका नाम लेना भी उसी तरह असभ्यता समझी जाती है।
इसको बच्चा बच्चा जानता है..? क्योंकि पाद ऐसा होता है
जो शुरु से ही बच्चों का मनोरंजन करता है ।
और इसीलिये बच्चे
कहीं भी पाद देते हैं..?? तब उन्हें बङे सिखाते हैं कि बेटा यूँ अचानक कहीं भी पाद देना उचित नहीं हैं..??
अब इन बङों को कौन सिखाये
कि पादा भी क्या अपनी इच्छा से
आता है..?? अरे वो तो खुद ही आता है।
अगर प्रधानमंत्री को भरी सभा में पाद आये तो पादेंगे नहीं क्या..? इसलिये पाद पर किसी तरह का नियंत्रण संभव
ही नहीं है ।
आपका यदि डाक्टरी चेकअप हो । तो ध्यान दें । डाक्टर ने
आपसे यह सवाल भी अवश्य
किया होगा कि पाद ठीक से
आता है... ?
क्योंकि डाक्टर जानता है कि पाद चेक
करने की अभी तक कोई अल्ट्रासाउंड
या एम.आर. आई. जैसी मशीन
नहीं बनी...? ये तमाम चूरन - चटनी
हाजमोला जैसी गोलियों का करोङों रुपये का कारोबार केवल इसी बिन्दु पर तो निर्भर है कि जनता ठीक से
पादती रहे ?
यदि आपको दिन में 4 बार और रात को लगभग 10 बार अलग
अलग तरह के पाद नहीं आते । तो आपके ये पाउडर लिपिस्टिक
सब बेकार है । क्योंकि अन्दर से
आपका सिस्टम बिगङ रहा है ।
यदि लिवर ही ठीक से काम नहीं कर रहा तो अन्य अंगो को पोषण कहाँ से मिलेगा ।
इसलिये पादने में संकोच न करें और खूब पादें।
क्योंकि पादना बुरी बात नहीं है भाई..?
पादों के प्रकार
पादों के पांच प्रकार होते हैं:-
1- पादों का राजा है "भोंपू" हमारे पूर्वज इसे उत्तम पादम् कहते थे।यह घोषणात्मक और मर्दानगी भरा होता है।इसमें आवाज मे धमक ज्यादा और बदबू कम होती है।अतएव
जितनी जोर आवाज उतना कम बदबू
2- 'शहनाई' - हमारे पूर्वजो ने इसे
मध्यमा ही कहा है।
इसमें से आवाज निकलती है ठें ठें या कहें पूंऊऊऊऊऊ
3- 'खुरचनी'- जिसकी आवाज पुराने कागज के सरसराहट जैसी होती है। यह एक बार में नई निकलती है। यह एक के बाद एक कई 'पिर्र..पिर्र..पिर्र..पिर्र' की आवाज के साथ आता है।
यह ज्यादा गरिष्ठ खाने से होता है।
4- 'तबला' - तबला अपनी उद्घोषणा केवल एक फट
के आवाज के साथ करता है।।तबला एक खुदमुख्तार पाद है क्योंकि यह अपने मालिक के
इजाजत के बगैर ही निकल जाता है। अगर बेचारा लोगों के बीच बैठा हो तो शर्म से पानी-पानी हो जाता है।
5- 'फुस्कीं' - यह एक निःशब्द 'बदबू बम ' है ।
चूँकि इसमें आवाज नई होती है इसलिए ये पास
बैठे व्यक्ति को बदबू का गुप्त दान देने के लिए बढ़िया है और दान देने वाला अपने नाक को बंद कर के मैने नई पादा है का दिखावा बङे
आसानी से कर सकता है । लेकिन गुप्त दान देने के बाद जापानी कहावत "जो बोला , सो पादा"
याद रखते हुए लोगों को खुद ही दाता को ताङने दीजिए । आप मत बोलिए।
अब पाद की श्रेणी निर्धारित करते हुए पाद का आनन्द उठाइये।
Thursday, 29 January 2015
Kosis kr k dekhiye....
🎯🎯 भगवद गीता में कुल 114 श्लोक हैं ,
😷उसमें से आपके जन्म वर्ष घटाकर देखाेगे ताे....
👤आपकी उम्र का पता लगेगा ......👇
Example:
Bhagvad Gita Shlok - 114
Birth year - 93
----------------
Current age 21
📣📣 अजीब है ना ..... !!!
Please try everyone....its fantastic....
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
Thursday, 22 January 2015
अपनी सोच
"ज़िन्दगी में खुद को कभी
किसी इंसान का आदी मत बनाना.....
…क्यूंकि इंसान बहुत खुदगर्ज है...
जब आपको पसंद करता है।
आपकी बुराई भूल जाता है.....
और जब आपसे नफरत करता है।
तो आपकी अच्छाई भूल जाता है...
"हज़ारो मैं मुझे सिर्फ़ एक वो शख्स चाहिये..
जो मेरी ग़ैर मौजूदगी मैं, मेरी बुराई ना सुन सके...."
आग लगी थी मेरे घर को,
किसी सच्चे दोस्त ने पूछा,
"क्या बचा है ?"
मैने कहा,
"मैं बच गया हूँ."
उसने हँस कर कहा,
"फिर जला ही क्या है.."
ज़िन्दगी मे जो भी हासिल करना हो...
उसे वक्त पर हासिल करो.....
क्योंकि.....
ज़िन्दगी मौके कम
और.....
धोखे ज्यादा देती है..।
Wednesday, 21 January 2015
कुछ ज्ञान की बात जो बाटने से बढ़ता है। अपनी राय दे और सेयर भी करे।
एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे
आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...
उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें
टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ...
उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ...
आवाज आई ...
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये ,
फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा
अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ...
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ
.. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा ..
सर ने टेबल के नीचे से
चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित
थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया
इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और
रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..
अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या
कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ...
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ...
यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे
और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय
नहीं रहेगा ...
मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने
बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ ,
घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ...
टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है
... बाकी सब तो रेत है ..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे ..
अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया
कि " चाय के दो कप " क्या हैं ?
प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...
इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन
अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।
( अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो )
Tuesday, 20 January 2015
16 संस्कारो का वर्णन
वैदिक कर्मकाण्ड के सोलह संस्कार
वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार निम्न सोलह संस्कार होते हैं:
1. गर्भाधान संस्कारः उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये प्रथम
संस्कार।
2. पुंसवन संस्कारः गर्भस्थ शिशु के बौद्धि एवं मानसिक विकास
हेतु गर्भाधान के पश्चात दूसरे या तीसरे महीने किया जाने
वाला द्वितीय संस्कार।
3. सीमन्तोन्नयन संस्कारः माता को प्रसन्नचित्त रखने के लिये,
ताकि गर्भस्थ शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो पाये, गर्भाधान के
पश्चात् आठवें माह में किया जाने वाला तृतीय संस्कार।
4. जातकर्म संस्कारः नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ
एवं दीर्घजीवी होने की कामना हेतु किया जाने वाला चतुर्थ
संस्कार।
5. नामकरण संस्कारः नवजात शिशु को उचित नामप्रदान करने
हेतु जन्म के ग्यारह दिन पश्चात् किया जाने वाला पंचम संस्कार।
6. निष्क्रमण संस्कारः शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और
मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने
की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में
किया जाने वला षष्ठम संस्कार।
7. अन्नप्राशन संस्कारः शिशु को माता के दूध के साथ अन्न
को भोजन के रूप में प्रदानकिया जाने वाला जन्म केपश्चात् छठवें
माह में किया जाने वालासप्तम संस्कार।
8. चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कारः शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं
शारीरिक विकास की कामना से जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे
अथवा पाँचवे वर्ष में किया जाने वाला अष्टम संस्कार।
9. विद्यारम्भ संस्कारः जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के
की कामना से किया जाने वाला नवम संस्कार।
10. कर्णवेध संस्कारः जातक की शारीरिक व्याधियों से
रक्षा की कामना से किया जाने वाला दशम संस्कार।
11. यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कारः जातक की दीर्घायु
की कामना से किया जाने वाला एकादश संस्कार।
12. वेदारम्भ संस्कारः जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से
किया जाने वाला द्वादश संस्कार।
13. केशान्त संस्कारः गुरुकुल से विदा लेने के पूर्व किया जाने
वाला त्रयोदश संस्कार।
14. समावर्तन संस्कारः गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से
किया जाने वाला चतुर्दश संस्कार।
15. पाणिग्रहण संस्कारःपति-पत् नी को परिणय-सूत्र में बाँधने
वाला पंचदश संस्कार।
16. अन्त्येष्टि संस्कारः मृत्योपरान्त किया जाने वाला षष्ठदश
संस्कार।
जीवन के कुछ वशुल
जिंदगी में दो चीज़ें हमेशा टूटने के लिए ही होती हैं:
"सांस और साथ"
सांस टूटने से तो इंसान 1 ही बार मरता है;
पर किसी का साथ टूटने से इंसान पल-पल मरता है।
जीवन का सबसे बड़ा अपराध -
किसी की आँख में आंसू आपकी वजह से होना।
और
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि -
किसी की आँख में आंसू आपके लिए होना।
जरुरत के मुताबिक जिंदगी जिओ - ख्वाहिशों के मुताबिक नहीं।
क्योंकि जरुरत तो फकीरों की भी पूरी हो जाती है;
और ख्वाहिशें बादशाहों की भी अधूरी रह जाती है।
मनुष्य सुबह से शाम तक काम करके उतना नहीं थकता;
जितना क्रोध और चिंता से एक क्षण में थक जाता है।
दुनिया में कोई भी चीज़ अपने आपके लिए नहीं बनी है।
जैसे:
दरिया - खुद अपना पानी नहीं पीता।
पेड़ - खुद अपना फल नहीं खाते।
सूरज - अपने लिए हररात नहीं देता।
फूल - अपनी खुशबु अपने लिए नहीं बिखेरते।
मालूम है क्यों?
क्योंकि दूसरों के लिए ही जीना ही असली जिंदगी है।
मांगो तो अपने रब से मांगो;
जो दे तो रहमत और न दे तो किस्मत;
लेकिन दुनिया से हरगिज़ मत माँगना;
क्योंकि दे तो एहसान और न दे तो शर्मिंदगी।
कभी भी 'कामयाबी' को दिमाग और 'नकामी' को दिल में जगह
नहीं देनी चाहिए।
क्योंकि,
कामयाबी दिमाग में घमंड और नकामी दिल में
मायूसी पैदा करती है।
कौन देता है उम्र भर का सहारा।
लोग तो जनाज़े में भी कंधे बदलते रहते हैं।
♻ सुखी जीवन के ६ मन्त्र ♻
1 अगर 'पूजा' कर रहे हो - तो 'विश्वास' करना सीखो !
2 'बोलने' से पहले - 'सुनना' सीखो !
3 अगर 'खर्च' करना है - तो 'कमाना' सीखो !
4 अगर 'लिखना' है - तो 'सोचना' सीखो !
5 'हार' मानने से पहले - फिर से 'कोशिश' करना सीखो !
6'मरने' से पहले - खुल के 'जीना' सीखो !